ओपेक यानी तेल निर्यातक देशों के संगठन का उदय तेल उत्पादक देशों की उस आकांक्षा से हुआ था, जिसके केंद्र में अपने संसाधनों, उत्पादन और आय पर अधिक नियंत्रण हासिल करने की इच्छा थी। 1960 में जब ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला ने बगदाद में इस संगठन की स्थापना की, तो उनका उद्देश्य केवल तेल की कीमतों को प्रभावित करना नहीं था। इसके साथ वे उस वैश्विक व्यवस्था को भी बदलना चाहते थे, जिसमें तेल उत्पादक देशों के पास संसाधन तो थे, लेकिन कीमत, उत्पादन और आय पर निर्णायक प्रभाव विदेशी कंपनियों और उपभोक्ता देशों का था।

इस पृष्ठभूमि में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का ओपेक और ओपेक प्लस से अलग होने को केवल उत्पादन कोटे पर मतभेद या क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा के रूप में देखना अधूरा होगा। यह ऊर्जा संप्रभुता की बदलती परिभाषा का संकेत है। 1960 में तेल उत्पादक देशों के लिए सामूहिक मंच बनाना जरूरी था, लेकिन आज 2026 में यूएई जैसे देशों को अपना हित स्वतंत्र निर्णय लेने में है। ओपेक ने तेल उत्पादक देशों को सामूहिक शक्ति दी थी। यूएई अब वही नियंत्रण सामूहिक उत्पादन सीमाओं के बजाय अपनी क्षमता, अवसंरचना और दीर्घकालिक राष्ट्रीय रणनीति के आधार पर हासिल करना चाहता है।

ओपेक की ऐतिहासिक भूमिका निर्विवाद है। उसने तेल उत्पादक देशों को अंतरराष्ट्रीय तेल कंपनियों और बड़े उपभोक्ता देशों के सामने सामूहिक शक्ति दी। 1970 के दशक में तेल केवल व्यापारिक वस्तु नहीं रहा, बल्कि वैश्विक राजनीति का केंद्रीय तत्व बन गया। सऊदी अरब ने अपने विशाल भंडार और अतिरिक्त उत्पादन क्षमता के कारण इस व्यवस्था में विशेष स्थान बनाया, लेकिन आज तेल बाजार पहले जैसा नहीं है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल उत्पादक है। रूस, कनाडा, ब्राजील, गुयाना और अन्य गैर-ओपेक तेल उत्पादक देश वैश्विक आपूर्ति को प्रभावित कर रहे हैं। 2016 में ओपेक प्लस का विस्तार इसी बदली हुई वास्तविकता की स्वीकृति था।

ओपेक अप्रासंगिक तो नहीं हुआ, लेकिन तेल बाजार अब उसकी मूल संरचना से आगे निकल चुका है। यूएई की रणनीति भी इसी से जुड़ी है। वह केवल तेल निर्यातक देश बनकर नहीं रहना चाहता, बल्कि वह ऊर्जा, लाजिस्टिक्स, वित्त, तकनीक और वैश्विक व्यापार में अपनी भूमिका बढ़ा रहा है। तेल उत्पादन सीमा से बंधे रहना उसकी व्यापक राष्ट्रीय रणनीति से मेल नहीं खाता। उसके लिए यह केवल तेल उत्पादन का विषय नहीं, बल्कि भविष्य की अर्थव्यवस्था से जुड़ा प्रश्न है। दुनिया में तेल की मांग अभी समाप्त नहीं हुई है, पर वैश्विक अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे विद्युतीकरण, स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु नीतियों की ओर बढ़ रही है।

ओपेक से यूएई का अलग होना केवल उत्पादन कोटे पर मतभेद नहीं, बल्कि बदलती ऊर्जा संप्रभुता का संकेत है। यह वैश्विक तेल बाजार में ओपेक की बदलती भूमिका और खाड़ी देशों की विविध ऊर्जा रणनीतियों को दर्शाता है, जहां यूएई भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए स्वतंत्र निर्णय ले रहा है।

ऐसे में कम लागत पर तेल निकालने वाले देशों के सामने बड़ा प्रश्न है कि क्या वे कीमतों को ऊंचा बनाए रखने के लिए उत्पादन सीमित रखें या अपने संसाधनों को समय रहते आय में बदलकर भविष्य की तैयारी करें? यूएई का झुकाव दूसरे विकल्प की ओर दिखाई देता है। ईरान-अमेरिका तनाव और होर्मुज स्ट्रेट के आसपास की अस्थिरता ने इस सोच को और प्रासंगिक बना दिया है। पाइपलाइन अवसंरचना के कारण यूएई के पास सीमित ही सही, लेकिन ऐसा विकल्प है, जो संकट के समय खरीदारों को अतिरिक्त भरोसा देता है। इसका महत्व एशिया के लिए विशेष है। भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश अब केवल तेल उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसकी दिशा प्रभावित करने वाले बड़े आयातक हैं। उनकी मांग, रिफाइनिंग क्षमता और दीर्घकालिक अनुबंध तेल उत्पादक देशों की रणनीति को प्रभावित करते हैं। यदि यूएई अधिक लचीला और भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता बनता है, तो एशियाई देशों की आपूर्ति सुरक्षा मजबूत हो सकती है और ऊर्जा कीमतों से जुड़ा आर्थिक दबाव कुछ कम हो सकता है।

 

अमेरिका ऐसी व्यवस्था को सकारात्मक मान सकता है, जिसमें तेल बाजार पर कुछ सीमित उत्पादकों का प्रभाव कम हो। रूस के लिए यह बदलाव मिश्रित है। जहां एक तरफ ओपेक प्लस ने उसे औपचारिक सदस्यता के बिना तेल समन्वय में भूमिका दी, वहीं दूसरी तरफ ओपेक के कम प्रभावी होने से उसका लाभ होना भी सुनिश्चित है। सऊदी अरब के लिए यूएई का निर्णय चुनौती है, लेकिन इसे क्षेत्रीय टकराव का नाम देना सही नहीं होगा। सऊदी अरब अपने तेल भंडार और उत्पादन क्षमता के कारण हमेशा महत्वपूर्ण बना रहेगा। यूएई का कदम इस तरफ इशारा करता है कि खाड़ी की ऊर्जा राजनीति अब अधिक विविध हो रही है। अब खाड़ी देश अपनी-अपनी ऊर्जा प्राथमिकताओं के अनुसार अलग रास्ते अपना सकते हैं।

 

चूंकि कई देश अब भी ओपेक को उपयोगी मानते हैं, इसलिए बड़े पैमाने पर सदस्य देशों के बाहर निकलने की संभावना कम है। फिर भी यूएई का कदम दिखाता है कि ओपेक पहले की तरह सभी सदस्यों को एक समान उत्पादन नीति में बांधकर नहीं रख पाएगा। ईरान के संदर्भ में भी संतुलन जरूरी है। उसके पास बड़े ऊर्जा संसाधन हैं, पर प्रतिबंधों और निवेश की कमी ने उसकी क्षमता सीमित कर दी है। ओपेक कमजोर होगा तो ईरान और खाड़ी देशों के बीच संवाद का एक मंच कमजोर पड़ सकता है। यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि भविष्य में क्या कोई बदलाव ओआइसी और अरब लीग जैसे संगठनों में भी होंगे?